प्रगति

बहुत दूर से चली आ रही हूँ ये सोच कर चल रही हूँ, कि कभी न कभी, घर आएगा जी उछल जायेगा, मन मुस्काएगा, थके तन और मन, दोनों को मिलेगी एक थाह, सुस्ताने की अब प्रबल हो गयी है चाह, पर घर है कि आता ही नहीं है,