सुख़नसाज़ की सौवीं पोस्ट

हालांकि यह ग़ज़ल पहले भी यहां सुनवाई जा चुकी है. बहुत विख्यात है. बहुत बहुत बार सुनी-सुनाई जा चुकी है मगर इस ब्लॉग की सौवीं पोस्ट के लिए मुझे यही सबसे उचित लगी. हफ़ीज़ जालन्धरी साहब का क़लाम. उस्ताद मेहदी