"अब पढ़ना मजबूरी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

खेल-कूद में रहे रात-दिन, अब पढ़ना मजबूरी है। सुस्ती – मस्ती छोड़, परीक्षा देना बड़ा जरूरी है।। मात-पिता,विज्ञान,गणित है, ध्यान इन्हीं का करना है। हिन्दी की बिन्दी को, माता के माथे पर धरना है।। देव-तुल्य